Home छत्तीसगढ़ वन अधिकार पट्टा से बदली श्रीमती पांचोबाई की तकदीर

वन अधिकार पट्टा से बदली श्रीमती पांचोबाई की तकदीर

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छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा संचालित धरती आबा अभियान ने एक बार फिर यह साबित किया है कि जब अधिकारों को काग़ज़ों में नहीं, ज़मीन पर उतारा जाए, तो वह ज़िंदगियों में बदलाव लाते हैं। जांजगीर-चांपा जिले के बलौदा विकासखंड के ग्राम छीतापाली की आदिवासी महिला श्रीमती पांचोबाई की कहानी इसी बदलाव की गवाही देती है।

वर्षों से अपने परिवार के साथ जंगल पर निर्भर रहकर खेती करने वाली श्रीमती पांचोबाई के पास अपनी ज़मीन का कोई कानूनी हक़ नहीं था। हर वर्ष उन्हें इस असमंजस का सामना करना पड़ता था, क्या हम अगली फसल भी इसी ज़मीन पर बो पाएँगे? लेकिन धरती आबा अभियान के अंतर्गत आयोजित जनजातीय ग्राम उत्कर्ष शिविर में उन्हें वह अधिकार मिला, जिसकी उन्हें वर्षों से प्रतीक्षा थी।

वन अधिकार पत्र सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज नहीं था, बल्कि उनकी ज़िंदगी में आत्मविश्वास, सुरक्षा और भविष्य की उम्मीदों की एक नई नींव भी बना। श्रीमती पांचोबाई कहती हैं अब मैं सिर्फ खेत में काम करने वाली महिला नहीं, बल्कि उस ज़मीन की हक़दार हूं जिस पर मैं सालों से जी रही हूं। अब मेरा परिवार निवासरत भूमि का मालिक है एवं सशक्त महसूस कर है।

वन अधिकार पट्टा मिलने के बाद उन्हें शासन की विभिन्न योजनाओं जैसे कृषि उपकरण, बीज सहायता और सामाजिक सुरक्षा पेंशन का लाभ भी मिलने लगा है। यह परिवर्तन सिर्फ उनके जीवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ग्राम की अन्य महिलाओं को भी जागरूक और प्रेरित कर रहा है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में चलाए जा रहे धरती आबा अभियान ने छत्तीसगढ़ के हजारों वंचित परिवारों को वन अधिकार की जमीन दी है। अब वे केवल जंगल में रहने वाले लोग नहीं, बल्कि उस ज़मीन के मालिक हैं जिस पर उनकी पीढ़ियों ने मेहनत की है। श्रीमती पांचोबाई की मुस्कान आज एक महिला की नहीं, बल्कि पूरे समाज के बदलाव की तस्वीर बन गई है।