Home छत्तीसगढ़ पुरावशेषों से पुरखों के रहन-सहन, खान-पान व अन्य तथ्यों के संबंध में...

पुरावशेषों से पुरखों के रहन-सहन, खान-पान व अन्य तथ्यों के संबंध में मिलती है जानकारीः मंत्री अमरजीत भगत संस्कृति मंत्री ने जमराव उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों प्रदर्शनी का किया उद्घाटन जमराव उत्खनन से मिले है एकमुख लिंग, लज्जा-गौरी, कुबेर, बलराम-संकर्षण, मातृदेवी, यक्ष-यक्षी की मूर्तियां टेराकोटा, कांच, शंख पत्थरों से बने मनके व चूड़ियां से होती है तत्कालीन लोगों के जीवन स्तर का संकेत

67
0
SAVE_20260918_191029
SAVE_20260918_191016
SAVE_20260918_191024

 रायपुर, 02 अक्टूबर 2021संस्कृति मंत्री श्री अमरजीत भगत ने आज महात्मा गांधी जी की 152वीं जयंती पर संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रम के दौरान दुर्ग जिले के पाटन तहसील में खारून नदी किनारे जमराव स्थित प्राचीन टीलों पर वर्ष 2018-19 और 2020-21 में पुरातत्वीय उत्खनन से प्राप्त मूर्तियों, सिक्कों, सिलबट्टा, मृतभाण्डों और टेराकोटा आर्ट जैसे पुरावशेषों की प्रदर्शनी का उद्घाटन का अवलोकन किया। उन्होनें कहा कि पुरातत्व विभाग द्वारा ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं को सहेजने-संवारने का कार्य किया जा रहा है। राज्य सरकार द्वारा ऐसे ऐतिहासिक व पुरातत्विक महत्व के स्थलों का चयन कर उत्खनन कार्य कराया जा रहा है, निश्चित ही इन पुरावशेषों से आने वाले पीढ़ी को अपने पुरखों के रहन-सहन, खान-पान एवं अन्य तथ्यों के संबंध में जानने-समझने को मिलेगा। पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने बताया की जमराव पुरातत्वीय उत्खनन से यहां लगभग दो हजार वर्ष पुराने गांव के बसाहट के अवशेष मिल रहे है। उपलब्ध प्राचीन पुरावस्तुओं से ज्ञात होता है कि यह खारून नदी द्वारा तरीघाट से जुुड़े व्यापार मार्ग में स्थित एक महत्वपूर्ण गांव कारीगरों की बस्ती थी। प्राचीन बसाहट के अवशेष और पुरावस्तुएं इतिहास के विभिन्न कालखण्डों (मौर्योत्तर काल से गुप्तोत्तर काल तक) के मिले है। इन पुरावशेषों का काल निर्धारण प्रथम सदी ईसा पूर्व से 6वीं सदी तक किया जा सकता है। अधिकारियों ने बताया कि प्राचीन बस्ती के भग्नावशेषों और उत्खनन के दौरान प्राप्त पुरावस्तुओं से तत्कालीन ग्रामीण संस्कृति के विभिन्न पहलुओं की जानकारी सामने आ रही है। इस वर्ष के उत्खनन में सबसे निचले स्तर के ब्लैक एंड रेड वेयर (बी.आर.डब्ल्यू.) संस्कृति के पात्र-परम्परा सहित अस्थियों के अवशेष भी प्राप्त हुए है, जिनका वैज्ञानिक परीक्षण और चारकोल सैम्पल के कार्बन-14 तिथि निर्धारण से जमराव की प्राचीनता और सुदूर अतीत में जाने की संभावना है। खुदाई में मिले लोहे और कांच के गलन अपशिष्ट, कुंभकार के आंवा जैसे साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रारंभिक ऐतिहासिक काल से लेकर पूर्व मध्यकाल तक जमराव शिल्पकारों-कर्मकारों (लोहार, कुम्हार, कांच की चूड़िया बनाने वाले कारीगर आदि) की एक सम्पन्न बस्ती थी। उत्खनन से प्राप्त एकमुख लिंग, लज्जा गौरी, कुबेर, बलराम-संकर्षण की मूर्तियों और मातृदेवी, यक्ष-यक्षी की मृण्मूर्तियों से वहां निवासरत तत्कालीन शिल्पियों के धार्मिक आस्था और उपासना पद्धति का ज्ञान होता है। कुषाण कालीन तांबे के गोल सिक्कों सहित छत्तीसगढ़ के गज प्रतीक वाले स्थानीय वर्गाकार तांबे के सिक्के, बाट-तौल भी मिले है जो व्यापारिक गतिविधियों के प्रमाण है। तत्कालीन लोगों के आभूषण जैसे टेराकोटा, कांच, शंख और अर्ध बहूमूल्य पत्थरों से बने मनके और चूड़ियां, धातु (तांबा) निर्मित छल्ले और चूड़िया भी मिली है, जो तत्कालीन लोगों के आर्थिक जीवन स्तर की ओर संकेत करती है। जमराव में उत्खनन कार्य संचालक श्री विवेक आचार्य के मार्गदर्शन और डॉ. पी.सी. पारख के निर्देशन में सम्पन्न कराया जा रहा है।