Home छत्तीसगढ़ लोहे के शहर में कला का इग्लू— नेहरू आर्ट गैलरी की अनकही कहानी

लोहे के शहर में कला का इग्लू— नेहरू आर्ट गैलरी की अनकही कहानी

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दुर्ग– भिलाई की औद्योगिक धड़कनों के बीच एक ऐसा सांस्कृतिक स्थल खड़ा है, जो बताता है कि फौलाद की दुनिया में भी कला की नर्मी, संवेदना और सौंदर्य साथ में धड़कते हैं। सिविक सेंटर में स्थित जियोडेसिक डोम— उल्टे कटोरे की आकृति वाला, बिल्कुल ‘इग्लू’ जैसा— न केवल अपनी अनोखी बनावट से, बल्कि भीतर सृजित रचनात्मक विरासत से आज कला-प्रेमियों का मन मोह लेता है। यही डोम वर्षों से ‘नेहरू आर्ट गैलरी’ के रूप में भिलाई की सांस्कृतिक आत्मा को थामे हुए है।

इस जियोडेसिक डोम की यात्रा उतनी ही रोचक है जितनी इसकी आकृति। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या 25 जनवरी, 1967 को जब भारत सरकार के तत्कालीन उप मंत्री (गृह मंत्रालय) श्री विद्याचरण शुक्ल ने यहाँ सुपर बाजार की शुरुआत की थी, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह संरचना एक दिन कला का तीर्थस्थल बनेगी। समय बदला, सुपर बाजार का भवन नया बना और यह डोम भिलाई महिला समाज को सौंप दिया गया। 1986 में यहाँ ‘रुचिरा रेस्त्रां’ चला था, कुछ समय तक पब्लिक लाइब्रेरी भी। हर बदलाव जैसे इस डोम को एक नए उद्देश्य की ओर ले जा रहा था।

फिर आया 1988— पं. जवाहरलाल नेहरू की जन्म शताब्दी का वर्ष, जब इस डोम ने अपना नया अवतार पाया। जनसंपर्क विभाग, नगर प्रशासन और सिविल इंजीनियरिंग विभाग के संयुक्त प्रयासों से इसे कला की गतिविधियों के लिए विकसित किया गया और नाम मिला— “नेहरू आर्ट गैलरी”। 14 नवंबर 1988 को “स्वप्नद्रष्टा नेहरू” प्रदर्शनी के साथ इसका उद्घाटन तत्कालीन महाप्रबंधक (संकार्य) श्री ए.के. दत्ता द्वारा किया गया, और गैलरी ने कला जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनानी शुरू कर दी। बीच के कुछ सालों में संसाधनों की कमी के कारण इस गैलरी को बंद करने की नौबत तक आ गई, लेकिन वर्ष 2011-12 में जनसंपर्क विभाग द्वारा इसका फिर से उन्नयन किया गया। आज जनसंपर्क विभाग सीमित संसाधनों के साथ नगर सेवा विभाग, विद्युत विभाग, उद्यानिकी और जनस्वास्थ्य विभाग के सहयोग से नियमित चला रहा है।

छठी दशक के पड़ाव की ओर बढ़ती इस गैलरी में अब तक दो हजार से भी अधिक प्रदर्शनियाँ आयोजित हो चुकी हैं। चित्रकला, कार्टून, मूर्तिकला, काष्ठ कला, फोटोग्राफी, मॉडल्स, डाक टिकट, सिक्कों की दुर्लभ श्रृंखलाएँ— हर रंग, हर रूप, हर शैली यहाँ अपनी भाषा बोल चुकी है। 1988 से 2025 के बीच 58 वर्षों में यह गैलरी राष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित हुई और आज भी उभरते कलाकारों के लिए प्रेरणा का केंद्र बनी हुई है।

गैलरी ने कई ऐतिहासिक प्रदर्शनी भी देखी हैं— सुविख्यात कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण की प्रदर्शनी, सोवियत ग्राफिक्स, दक्षिण मध्य सांस्कृतिक केंद्र नागपुर और मध्यप्रदेश कला परिषद भोपाल की प्रस्तुतियाँ। इस कला मंदिर में आदिवासी कला आधारित ‘चिन्हारी’, महात्मा गांधी की 125वीं जयंती पर “तुम बापू के लाल जवाहर”, तथा सेल स्तरीय पेंटिंग्स प्रदर्शनी जिसका उद्घाटन प्रसिद्ध कलाकार जतिन दास ने किया— ये सभी इस गैलरी की विरासत के स्वर्ण अध्याय हैं।

अंचल के प्रतिभाशाली बच्चों और नए कलाकारों को प्रशिक्षित करने के लिए यहाँ समय–समय पर कार्यशालाएँ आयोजित होती रही हैं, जिनमें उज्जैन के श्री आर.सी. भावसार जैसे ख्यातिलब्ध कलाकार भी शामिल हुए— यह बताता है कि यह स्थान केवल प्रदर्शनी स्थल नहीं, बल्कि सीख और सृजन का जीवंत केंद्र है। यहाँ कला और कलाकारों को बढ़ावा देने के लिए प्रत्येक महीने 2 प्रदर्शनियों का आयोजन किया जाता है, जो शहरवासियों के लिए निशुल्क है। यह यहाँ के कलाकारों एवं इंदिरा कला संगीत विश्वविधालय के छात्रों को अपनी कला प्रदर्शित करने के लिए एक मंच भी प्रदान करता है।

इग्लू समान यह डोम भले वास्तुकला का अद्भुत नमूना न हो, लेकिन नेहरू आर्ट गैलरी के भीतर धड़कती कला, भिलाई इस्पात संयंत्र की सांस्कृतिक विरासत और संवेदनशीलता का सबसे सुंदर प्रतिबिंब है। यहाँ रखी हर प्रदर्शनी, हर रंग-रेखा और हर सृजन यह कहता है— “जहाँ उद्योग है, वहाँ संस्कृति भी खिलती है; और जहाँ संस्कृति जीवित रहे, वहाँ समाज सशक्त होता है।”